‘नेस्ट बॉक्स, बर्ड फीडर, देशी पौधे लगने दो
इन नन्ही चिड़ियों का भी घर बसने दो’
‘एक मुठी अनाज, एक कटोरी पानी चाहिए बस
इन चिड़ियों को खिलखिलाकर हसने दो’ ।
20 मार्च 2010 को पहली बार विश्व गौरैया दिवस मनाया गया था। करनाल के पक्षी प्रेमी संस्था सत्य फाउंडेशन के सदस्य गौरैया के अस्तित्व को बचाने को लेकर समर्पित हैं और अपने शहर व आस पास के क्षेत्र में पाई जाने वाली गौरैया की प्रजाति का संरक्षण करने में लगे हैं।
आंगन में फुदकती-चहकती एक नन्ही सी चिड़िया.. जिसे देखकर घर के सब सदस्यों का मन हर्ष से भर उठता है। जी हां, हम बात कर रहे हैं, उस छोटी सी चिड़िया की जिसे गौरेया भी कहा जाता है।यह छोटा-सा दिखने वाला पक्षी हम सब के बचपन की बहुत सारी यादों के साथ जुड़ा हुआ है। वर्तमान में बढ़ते शहरीकरण में इसे बचाना ज़रूरी है। बढ़ते प्रदूषण, यातायात, पतंगबाजी इत्यादि से इस पक्षी पर खतरा बना रहता है। इनके चहकने की आवाज सुनकर ही मन आनंद से भर उठता है।
करनाल के श्यामनगर में करीब एक हजार से अधिक चिडिय़ों घर बने हुए हैं, यहां पर हमेशा गौरेया की ची-चीं की आवाज सुनाई देती रहती हैं।गायब हो रही गौरेया की इतनी बड़ी संख्या को देखकर लोगों ने गौरेया के निवास स्थान को गौरेया एन्क्लेव चिडिय़ों का मौहल्ला का नाम दे दिया ! यहां पर 3 चिडिय़ां से बढक़र करीब 3 हजार से अधिक गौरेया की संख्या पहुंच चुकी हैं। क्योंकि गौरेया को निवास पंसद आ रहा हैं।ये सब हुआ हैं गौरैया के अस्तित्व को बचाने को लेकर समर्पित करनाल स्तिथ सत्या फाउंडेशन सदस्यों के अथक प्रयासों की बदौलत।यहीं नहीं प्रशासनिक अधिकारी गौरेया के निवास को देखने आते है तो लोगों की समस्याओं का तेजी से निवारण भी होने लगा है ! गौरेया को देखकर लोगों में काफी परिवर्तन आया हैं, गौरेया के प्रति नजरिया बदला हैं।
गौरेया संरक्षण कैसे किया-
में 6 सालों से काम कर रहे संदीप नैन ने बताया कि सत्या फाउंडेशन की एक नई और अनोखी पहल रंग लाई है, जो गौरैया संरक्षण पर पिछले 6 साल से काम कर रही हैं। संस्था अब तक 1200 से अधिक मजबूत लक्कड़ के घोंसले बनावा कर अनेक जगह पर लगवा चुकी है। संस्था द्वारा विश्व गौरैया दिवस, राहगिरी, पार्कों, मंदिर, हाईवे आदि पर 1100 से अधिक घोसलें को आमजन को नि:शुल्क वितरित किया। श्यामनगर में 5 साल पहले शुरू की अनोखी पहल उन्होंने कहा कि शाम-नगर करनाल में 5 वर्ष पहले कुछ आशियाने बनाकर गौरैया को आमंत्रित करने का फैसला किया। उन्होंने गौरैया के लिए पुराने डिब्बों को काटकर 5 घोसले लगाए। थोड़े ही दिनों में सभी घोसलों में चीं-चीं की आवाज गूंजायमान हो रही थी। इसके बाद लकड़ी के करीब 950 से अधिक घोंसलें घरों के आगे लगाएं, जिनमें चिडिय़ां रहने के लिए आई ।
लोग मांगते घोंसले पर संसाधनों की कमी-
उन्होंने कहा कि गौरेया को खाने की दिक्कत न हो, इसे देखते हुए बर्ड फीडर बनाकर उनमें एक-एक महीने का मिक्स दाना, जिसे गौरेया अधिक पंसद करती हैं, रखा जाता हैं ! अब तो लोग घोंसले मांगते है ताकि उनके आंगन में भी चिडिय़ां की आवाज गूंजे, लेकिन संसाधनों की कमी होती हैं ! मांग पूरी नहीं कर पाते, इसे देखते हुए बहुत से लोग अपने आप ही अलग-अलग तरीकों से घोंसले बना लेते हैं।
कीटनाशकों व क्रंक्रीट जंगलों की वजह से गायब हो रही गौरेया-
संदीप नैन ने बताया कि घरों के बाहर कीटनाशक दवाइयों का छिड़काव का सेवन करने से गौरैया पक्षी का जीवन खत्म हो रहा है। शहरों का बेतरतीब विकास, घटते वृक्ष व हरियाली और कंक्रीट के बढ़ते जंगलों के बीच घरेलू चिडय़िा के नाम से पहचानी जाने वाली गौरैया कहीं खो गई थी। मगर हमारे और लोगो के प्रयास से अब गौरैया की वही चीं-चीं की आवाज गूंजायमान हो रही है और गौरैया का आना जाना फिर से शुरू हो गया है।